हरकीरत ' हीर'
लाशें ......
(१)
आसमां का इक नुकीला सा कोना
चुभने लगा है सांसों में
निरुपाय सी मैं देखती रहती हूँ
रौशनी को अँधेरे में घुलते हुए .....
सामने दो बांसों के बीच जलती हुई रस्सी
खामोश है ......
अन्धा कुंआं और डरावना हो गया है ......
सहसा पानी की सतह पे तैर जाते हैं
मन की लाशों के निशाँ ....
एक वाद्ययंत्र बजने लगता है
शब्द आहिस्ता-आहिस्ता
मौन साध खड़े हो जाते हैं .....!!
(२)
तुमने कहा था मैं आऊंगा
अपने छोटे से नये घर से
देर रात गए
तेरी बिखरी सांसों का
माथा सहलाने .....
रात भर शब्दों में छीना-झपटी
चलती रही .....
कभी एक सामने आ खड़ा होता
कभी दूसरा .....
धीरे धीरे आस साथ छोडती गई
कुछ स्याह उम्मीदें
सफ़ेद कपड़ों में लिपटी
ताबूतों में चली गईं ....
मैंने कुछ पन्ने साथ बाँध लिए हैं
तुम आना पढने ....
इससे पहले कि शब्द भी
धुल जायें ......!!
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हरकीरत ' हीर'
कुछ क्षणिकाएं .........(१)
बलात्कार के बाद .....कुछ आवारा बादल
गली के उस पार
भागते हुए निकल गए
मैंने खिड़की से बाहर झाँका
चाँद उकडूं बैठा सिसक रहा था
अफवाह ने करवट बदली
हिन्दू - मुस्लिम दंगे भड़कने लगे ....!!
(२)
गरीबी .....अच्छा हुआ वक़्त ने
नहीं पूछा ख़ामोशी का राज़
वर्ना उसकी आँखों में
चूल्हे की बुझी राख देख ...
फिर बरस पड़ते बादल .....!!
(३)
इक्कीसवीं सदी का प्रेम .....अछूता नहीं है कहीं भी
नष्ट-भ्रष्ट धंसा हुआ अतीत
दूर सूखी घास पर
अधजले टुकड़े सा
खंडहर हुआ जा रहा है
इक्कीसवीं सदी का प्रेम .....!!
(४)
शबाब बखेरती तितलियाँ .....भूमिगत कब्रिस्तान से
अंकुरित तितलियाँ
पौधों की जड़ों से चूस लेती हैं खून
इंसानी सोच का .....
बहुरंगी भाषाओँ से खुशबू बिखेरती हैं
शबाब की इस दाखिली पर
झुक जाता है चेहरा ...
शर्म से .....!!
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हरकीरत ' हीर'
वह समुंदर में पांसे फेंकती
पूरे चाँद की रात ....
हुस्न का मुजरा करती
घुंघरूओं की रुनझुन
छलने लगती बुर्के की ओट में
मोहब्बत की ज़मीं ....
मेरे सामने के पहाड़
एक-एक कर ढहते गए ....
बेवफा चांदनी ...
गढ़ने लगती जुबां की सेज ....
नित नए 'स्वाद ' की चूरी
तोड़ डालती जिस्म की प्यास
उमर की जुंबिश उड़ा ले गई
शर्म की चुनरी .....
सुन अमृता
क्या तूने भी ओढ़ी थी
मोहब्बत में झूठ की चादर .....?
सोचती हूँ
ख़ामोशी के बाद भी
मैं क्यों न दे पाई तुझे तलाक ....
आज ...
बेआबरू सी मैं
रख कर चल देती हूँ
अपने ही कंधे पे हया की लाश ......
नहीं रांझिया
मैं तेरी मोहब्बत को यूँ ......
शर्मसार न होने दूंगी
देख मैंने बाँध लिया है इसे गठरी में
आ ले जा मुझे और कब्र बना दे .....!!
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हरकीरत ' हीर'
सुइयों की पोटली है .....जो अक्सर सुलगाती रहती है इक आग ....वह अंधेरे में छोटी-बड़ी लकीरें खींचती है .....सीढियों से अँधेरा उतर कर आता है .....और रख देता हैं पाँव.....बड़ी लकीर मिट जाती है .....वह फ़िर छोटी हो जाती है ....बहुत छोटी .....हक़ीर सी .....!! '' कुछ क्षणिकायें .....''(१)
तलाक ......................
वहशी बादल
जमकर बरसे फ़िर कल रातसुई जुबां से लहू कुरेदती रही
सबा तो खामोश रही दोनों के बीच
बस तेरा चेहरा तलाक मांगता रहा .....!!
(२)
कफ़न ....................
मैं कफ़न उतार के बैठी थी
कुछ हसीं रूहें .....
चुरा ले गई कफ़न मेरा
तुम यूँ न बिछड़ना मुझ से
मोहब्बत यतीम हो जाएगी ......!!
(३)
पत्थर होते छाले...................................
मेरे इश्क़ के कतरे
पत्थरों पे गिरते रहे
और रफ्ता -रफ्ता दिल के छाले
पत्थर होते गए.....!!
(४)
गिला .............
गुज़र जाता अगर दरिया चुपचाप
मैं ख्यालों को रख लेती ज़ख्मों तले
गिला तो इस बात का है
वह जाते-जाते छू गया ......!!
(५)
तू ही बता .........................
मैंने ज़िस्म में
जितने भी मुहब्बतों के बीज थे
तेरे नाम की
लाकीरों पे बो दिए हैं
अब तू ही बता मैं ख्यालों को
किस ओर मोडूं .....!?!
(६)
अर्थियाँ .........................
मोहब्बत खिलखिला के
हंसने ही वाली थी के गुज़र गई
कुछ अर्थियाँ फ़िर करीब से .....!!
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हरकीरत ' हीर'
आज की शाम फ़िर बड़ी बेवफा निकली ....मन है कि यादों की पुरानी गठरी खोले बैठा है ....जरा से पन्ने पलटती हूँ तो शब्द इक तड़प लिए इधर -उधर बिखरे नजर आते हैं .....मैं सहानुभूति के लिए कंधे पे हाथ रखती हूँ तो ...छूते ही इक नज़्म उतर आती है .......न जाने क्यूँ तेरी बातों में अब वो पहले सी महक नहीं आती
ख़त तो अब भी आते हैं तेरे मगर वो खुशबू नहीं आती
चलो अब लौट जायें , ख्यालों से उतर जायें
खलिश ये और गमे-दिल की सही नहीं जाती
बहुत रोया है रातों को , बहुत तड़पा है दिल मेरा
तेरे ख़्वाबों में गुजरी वो रातें बिसारी नहीं जातीं
आ फेर लें मुँह तान लें फ़िर वही अजनबी सी चादर
बेरुखी ये तेरे दिल की , अब और सही नहीं जाती
बदल ली हैं राहें अब , कदम भी हैं लौट आए
न जाने क्यों ख्यालों से तेरी आहटें नहीं जातीं
आ अय दर्द थाम ले मुझको अपनी बाँहों में
ये मय
अब आखिरी प्याले की उठाई नहीं जाती
न जाने क्यूँ तेरी बातों में अब .........................
ख़त तो अब भी आते हैं तेरे मगर ..............!!
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